शाश्वत की डायरी - भाग 10
आज के विचार
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ।
( योगदर्शन )
डायरी क्रमशः से आगे -
हे शाश्वत ! क्यों चिन्ता करते हो ? तुम्हें क्या लगता है तुम्हारी कमी कमजोरियों को मैं नही जानता ! मैं गुरुतत्व हूँ ..........मैं सदैव तुम्हारे साथ रहता हूँ ..........तुम्हारी बुराइयों से रक्षा करता हूँ ।
तुम निश्चिन्त क्यों नही होते ? चिंताओं को क्यों नही छोड़ देते ?
जब मैं तुम्हारे हृदय के कोने कोने से परिचित हूँ ......तो तुम अपने दोष अवगुण छुपाने में अपनी ऊर्जा क्यों नष्ट कर रहे हो ?
हे शाश्वत ! मैं तुम्हारे दोषों को नही गिनूँगा ............तुम्हारे गुण को देखकर नही रिझुंगा ..........मैं तो गुण दोष से रहित उस शाश्वत को चाहता हूँ ..........तुम मत घबड़ाओ मुझ से ............तुम चिंताओं को त्याग दो ..........मैं तुम्हारे साथ हूँ .......अब तो निश्चिन्त हो जाओ !
मैं तुम्हें इसलिए चाहता हूँ कि तुम ईमानदार हो ...........और हर गुरु उस शिष्य से ही प्रेम करता है जो अपनी साधना के प्रति ईमानदार हो !
तुम अन्तःकरण से ईमानदार हो ......इसलिये गुरुतत्व तुम्हें चाहता है ।
आहा ! ये शब्द मेरे गुरु के थे .....जो मेरे अन्तःकरण में विराजे गुरु मुझे बारम्बार समझा रहे थे ।
मेरे नेत्रों से अश्रुप्रवाह चल पड़े ।
अब उठो ! शाश्वत ! उठो ! ..................
मुझे झकझोरा था मेरे गुरु ने ..............मैंने अपनी आँखें खोली थीं ।
आहा ! मुझे लग रहा था कि समस्त "पर्वत मालायें" मुझे आशीष दे रही हैं..........।
मुझे सुगन्धि आरही है ................पहाड़ियों में खिले वे फूल मुझे सुगन्ध से भर देना चाहते हैं ।
मैं उठा .............पर उठा नही गया मुझ से .........
रुको शाश्वत ! तीन दिन से तुम समाधि में हो ..........शरीर की अपनी एक सीमा होती है ....इसलिये तुम्हें कमजोरी लग रही होगी ।
मेरे गुरु ने मुझ से कहा .............।
क्या ? मैं चौंक गया .............तीन दिन से ?
हाँ आज पूरे तीन दिन हो गए .................
तुम देहातीत हो गए थे ................तुमने ध्यान लगाया .........और ध्यान लगाते ही ........समाधि में तुम चले गए .........सहज में ही ।
ये तुम्हारे ऊपर ईश्वर की कृपा थी......तुम्हारे ऊपर ईश्वर की कृपा है ।
मैं बाहर ही बैठा रहा ? ......यहीं तीन दिन से ?
मुझे आश्चर्य हो रहा था .......मैं शाश्वत यहीं बैठा रहा ?
हाँ ......... बर्फबारी होती रही ........पर तुम्हें पता नही चला !
मैं तुम्हारे शरीर की रक्षा कर रहा था.......कम्बल ओढ़ा देता था ....जब जब बर्फ और बारिश होती थी तो बरसाती लाकर ओढ़ा देता था ।
मैं सोच में पड़ गया ..............ये सब मेरे साथ हुआ ?
मेरे गुरु , वो महात्मा जी स्टोव जला रहे थे ............मेरे लिए कुछ गर्म पेय बनाने के लिए .....शायद चाय ......जड़ी बूटी की चाय ।
"मैत्रेयी भी आई थी"
....ये कहते हुए मेरे चेहरे को गौर से देखा था महात्मा जी ने........मानो वो इस बात को कहकर मेरे मन की दशा का मूल्यांकन करना चाह रहे थे ।
मैं शान्त ही रहा .................।
मेरे शान्त भाव को देखकर वो फिर निश्चिन्त से हो गए थे ......और स्टोव पर रखे बर्तन में जड़ी बूटी डालकर उसे उबालने लगे थे ।
क्या कह रही थी मैत्रेयी ?
मेरे इस प्रश्न पर महात्मा जी हँसे .........खूब हँसे ..............
कह रही थी ........तुम से प्रेम करती है ......तुम्हें बहुत चाहती है ।
इतना कहकर महात्मा जी फिर चुप हो जाते थे और मेरे चेहरे को पढ़ने लगते ।
आप मेरे चेहरे को इस तरह क्यों देख रहे हैं .........आप तो सब कुछ जानते हैं ना सरकार ?
मेरे इस बात को सुनकर वो हँसे .....खूब हँसे ।
वो कह रही थी ...........कि तुम्हारे साथ रहकर साधना करेगी ।
आपने क्या कहा ?
मैंने कहा ...........साधना ? किसकी साधना ?
उसने कहा .........आध्यात्मिक साधना ........
आध्यात्मिक साधना तो मैत्रेयी ! अकेले ही होती है ।
वो फिर कुछ नही बोली ......बुद्धिमान थी .........इतनी बात में ही समझ गयी कि मैं आगे क्या तर्क देने वाला हूँ उसे ।
मुझ से थोड़ी देर बाद बोली ........मैं शाश्वत के पास जा सकती हूँ ।
हाँ .....जाओ ! पर छूना नही उसे ...............अभी वो दूसरे लोकों में भ्रमण कर रहा है ........दूसरे जन्मों का अनुभव ले रहा है .......क्यों कि उसकी ये इच्छा थी ।
ओह ! हाँ ............गुरुदेव ! मैं पर्वत बना था ! मैं नदी बना था ! मैं फिर वृक्ष बना था .............हाँ मुझे अब याद आरहा है ।
मुझे सब पता है .......ये समाधि नही थी तुम्हारी ........समाधि अलग होती है ......मैंने ऐसे ही कह दिया कि समाधि है .....पर तुम स्वयं घूम रहे थे .....लोकों में .......और योनियों को समझ रहे थे ....और इन सबसे कैसे मुक्त हुआ जा सकता है ....इसको भी समझ रहे थे...इसलिये मैं तुम्हें देखता था तुम कभी कभी तनाव में भी आजाते थे ।
तुम मुक्ति की यात्रा में थे ..............हाँ क्रम मुक्ति !
मैं एक ऋषि से झगड़ रहा था .........वो कोई दिव्य लोक था .........
( इस प्रसंग में शाश्वत ने अंग्रेजी में लिखा है ....."जिसे नही मानना हो इस बात को , वो इसे मेरी कल्पना मान सकते हैं ....क्यों कि इस बात को सिद्ध करने का मेरे पास कोई प्रमाण नही है".......शाश्वत आगे लिखता है ........."वैसे तीन दिन तक मैं समाधि में रहा ....ये मेरे गुरु की कृपा से ही हो सका .....और उस अवस्था में जो मैंने अनुभव किया ........उससे मुक्ति का क्रम मेरे सामने खुल गया था .....ये ज्ञानियों की मुक्ति है .......भक्तों की नही .....इस बात का ध्यान रखें" )
वो कौन सा दिव्य लोक था शाश्वत ? ? मेरे गुरु ने पूछा ।
लोक मुझे पता नही ।
पर हाँ मुझे वहाँ एक ऋषि मिले ............और मैंने जब उन्हें प्रणाम किया तो बोले .............तुम्हें पर्वत की गति मिली है ..........तुम पहाड़ बनोगे .......।
शाश्वत कहता है ......मैंने उन ऋषि से कहा .....जड़ ? मैं जड़ बनूँगा ?
जड़ क्या होता है ? मुझे फटकार दिया उन ऋषि ने ।
हाँ गुरुदेव उन ऋषि के शिष्य थे .........बहुत शिष्य थे ...............
मुझे जब फटकारा तब मैं भी चुप हो गया ...........
फिर मुझ से बोले ......जड़ जैसी कोई सत्ता है ?
अब तुम क्या हो ? जड़ या चैतन्य ? .........
मैं कुछ बोलूँ उससे पहले ही वो बोल गए थे ......शरीर जड़ है ........पर इसके अंदर का तो चैतन्य है ना ? .......
मैं तो चैतन्य हूँ .................मैंने कहा ।
हाँ ...........तुम ही पर्वत के अधिदैव बनोगे ........।
यानि शरीर तुम्हारा पर्वत होगा ......भीतर तो तुम चैतन्य ही हो ।
पर मैं पर्वत कैसे बना ? मुझे इस पर्वत का शरीर क्यों मिला ?
अंत में तुमने पर्वत को ही देखा था...उसके प्रति दया से भर गए थे ।
हाँ .............जब मैंने मृत्यु का अनुभव किया था तब मैंने देखा था गुरुदेव ! कि किसी ने आकर डाइमास्टिक बम लगा दिया इस पर्वत में ........और मेरे देखते ही देखते पर्वत के चीथड़े उड़ गए थे ।
ओह ! बेचारे पर्वत !
दया करना भी मुक्ति में बाधक है ?
मैं शाश्वत फिर झगड़ा करने लगा था उन ऋषि से ।
दया.! .......ये भक्तों का विषय है ..........भगवान के भक्तों का ......और भक्त मुक्ति कहाँ चाहते हैं ............पर ज्ञानी दया क्यों करने लगे ?
किसके ऊपर दया ? जब सब ही ईश्वर हैं तो दया किसके ऊपर ?
तुम ज्ञानी थे .......बम से पर्वत को उड़ाने वाले के प्रति भी तुम्हें ईश्वर बुद्धि रखनी थी ...........समता तभी तो आती ना ?
उन ऋषि ने मुझे समझाया ।
फिर दया.........इन सबका क्या कोई महत्व नही ?
ये सत्व गुण है ..........पर ज्ञानी त्रिगुणातीत है ।
तुम त्रिगुणातीत नही बन सके .................
गुण ही जन्म मृत्यु का कारण हैं .............सत्व गुण भले ही अच्छा हो ....पर गुण तो गुण है ....बाँधता ही है ... जंजीर चाहे सोने की या लोहे की क्या फर्क पड़ता है ? दया के कारण ही तुम पर्वत बनोगे .....।
क्यों दुःखी हो रहे हो ..........तुम चींटी नही बने .........पहाड़ बने हो .....ये दया का ही फल है कि तुम पहाड़ बनें ........तुम्हारे से झरने फूटेंगे ..........वृक्ष निकलेंगे ..........उससे समाज को कितना लाभ होगा .....कितनी सेवा होगी .........तुमसे ......यही तो तुम चाहते थे ना ?
शुद्ध अन्तःकरण के थे तुम ....दया समाज के प्रति थी तुम्हारे मन में ......पर्वत को टूटते हुए देखा नही गया तुमसे ........तुम्हारे अन्तःकरण में ये भावना आई .....काश ! ऐसी सेवा मेरे द्वारा भी होती जैसी इन पर्वतों के द्वारा होती है ..... ..........!
अन्ते मति सा गतिः
( अंत में जिसका चिन्तन होगा , आप वही बनेंगे ...यही नियम है )
पर्वत भी कई प्रकार के होते हैं .......रूखे सूखे .....भुरभुरे .........पर तुम झरनों से लवालव , हरित पर्वत बनोगे .....ताकि जन मानस को तुम छायाँ जल इत्यादि जीवन दायनी वस्तु दे सको ........।
ओह ! ये तो अच्छी बात है ....जन कल्याण की बात है ।
क्या करता तो मैं ...........मुझे इसी बात पर सन्तोष करना ही पड़ा ......।
और वैसे भी विवेकवान जीव अपने आपको समझा ही लेता है ।
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गुरुदेव ! मैं पर्वत बना ।
ऋषि लोग मेरे पास आते ...जप ..करते .......तप करते .......
मुझे अच्छा लगता ......मुझे बहुत अच्छा लगता ।
पर धीरे धीरे युग बिगड़ता गया .....................
कलियुग आगया था ...........
लोग अपने स्वार्थ के लिए मेरे पास आते थे ..............
पहले तो मुझे अच्छा लगता ......कि चलो लोग आरहे हैं .......एकाध ऋषिओं को ही आश्रय दिया था मैंने .....पर अब नगर के नगर मेरे पास आरहे हैं ............पर ये क्या ! मनुष्य खराब हो गया था .....मनुष्य बहुत बुरा हो गया था ......मैंने सोचा भी नही था कि ईश्वर की सबसे सुंदर सृष्टि मनुष्य .......... वो ऐसा होजायेगा !
पहले तो मनुष्य ने बस्ती बनानी शुरू की ........फिर बम लगाकर मुझे तोड़ने लगे .........मैंने उन्हें समझाया ......ऐसा मत करो .........इससे तुम्हें ही हानि है .......मैं तो हर तरह से तुम्हारी सेवा के लिए ही हूँ ........मुझ से ईंधन मिलेगा तुम्हें ........जल मिलेगा तुम्हें .......हरियाली से स्वच्छ प्राण दायिनी वायु मैं ही दूँगा .........मत तोड़ो ....मत तोड़ो ।
पर मनुष्य कहाँ मानने वाला था .........वो तो विकृत ही हो चुका था ।
मुझे खतम कर दिया ...........मुझे मार दिया ।
ओह ! ये बताते हुए मेरे शरीर से पसीने आरहे थे ।
गुरुदेव ! जब मनुष्य मुझ पर्वत को तोड़ रहे थे ना .....तब मेरे मन में आया था .....काश ! इससे बढ़िया मैं नदी बनता .....तो शायद अच्छा होता....जन सेवा ज्यादा कर पाता ....प्यासों को पानी पिलाता ।
फिर मैं नदी बना ...........................।
गुरुदेव हँसे थे मेरी बात सुनकर ।
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
हे शाश्वत !
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साधकों ! यहाँ शाश्वत ने जो ध्यान की अवस्था में अनुभव किया उसे लिखा है .....इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में भी है ....भागवत के द्वितीय स्कन्ध में .........भागवत में लिखा है ..............जब ज्ञानी पुरुष देह की मृत्यु के बाद ऊँचे लोक में जाता है .....तब वहाँ से वो देखता है कि पृथ्वी के लोग तो बहुत दुःखी हैं ......तो वह उस समय दया के वशीभूत होकर पृथ्वी में ही जन्म लेता है ........पहले पर्वत बनता है ...........।
साधकों ! इस मुक्ति को भागवत या अन्य शास्त्र पुराणों ने "क्रम मुक्ति" का नाम दिया है ।
ये ज्ञानियों की मुक्ति है ...........भक्तों की ऐसी मुक्ति नही होती ।
अब इन्तजार करिये कि इस क्रम मुक्ति को समझने के बाद जल्दी से जल्दी शाश्वत वृन्दावन आये ....और परम प्रेम को पाये ।
पर अभी उसके लिए थोड़ा इंतज़ार कीजिये ।
हाँ ....एक बात शाश्वत ने विचित्र कही है .........कि "दया" के कारण इसे पर्वत बनना पड़ा ...........हाँ ............ये बात तो है ......दया "गुण" है .......क्या आपको पता नही है ..........कि भरत राजा ने हिरण के बच्चे के प्रति दया की .......तो वह हिरण ही बने थे ।
दया नही .....प्रेम करो ................ये सूत्र अंग्रेजी में शाश्वत ने अपनी डायरी में ही बड़े अक्षरों में लिखा है ।
दया भी बन्धन का कारण है ।
दया न करे तो सन्त कसाई , दया करि तो आफ़त आई ।
ये लिखा है शाश्वत ने ...........इसलिये दया नही ..प्रेम !
चलिए गम्भीरता से पढ़िए इस शाश्वत की डायरी को ........
इसमें बहुत अध्यात्म के रहस्य खुलते जायेंगें ..........
डायरी क्रमशः ....
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