श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव || भाग 49
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! सखियों द्वारा लाल जू का गुणगान !!
****************************
गतांक से आगे -
हे रसिकों ! नित्य निकुँज में सखियाँ ब्याहुला उत्सव मना रही हैं ....कहना होगा कि सारे रसों को अपने हृदय में समेटे ये सखियाँ नेत्रान्जलि में भर भरकर उस दिव्य रूपामृत का पान कर रही हैं । ये कभी वात्सल्य से भर जाती हैं ...तो इन्हें चिन्ता होने लगती है कि बहुत देरी हो गयी इन दोउ नवल किशोर और किशोरी ने कुछ खाया नही है ...इन्हें खिलाऊँ । सखी का हृदय वात्सल्य से भर जाता है । जब चरण चाँपती हैं तब इनके मन में आता है ...आहा ! मैं तो इन परमोदार श्रीराधिका महारानी जू की दासी हूँ ...और अपने को “राधा दासी” कहकर ये इतराती हैं ।
प्यारी जू ! यहाँ आपके कपोल में दंत क्षत हुआ है ...तब सखी की बात सुनकर प्रिया जू शरमा जाती हैं ...फिर सखी को लेकर एक कुँज में चली जाती हैं ....फिर अपनी बात बताती हैं ...बताते बताते चल देती हैं ...सखी साथ में ही हैं ....आहा ! गलवैयाँ देकर चल रही हैं सखी को प्रिया जी ...तब गदगद होकर सखी के हृदय में सख्य भाव या कहो मैत्री भाव जागृत हो जाता है ।
हे रसिकों ! ये सखियाँ सामान्य नही हैं ....ये सर्व रसों से सम्पन्न होकर इन दम्पति किशोर-किशोरी को रिझाती रहती हैं । माधुर्य का सार सर्वस्व हैं युगल वर ...तो ये सखियाँ गुण कलानिधि हैं ....ये सम्पूर्ण कला और गुण गण से भरी हुयी ...प्रेम में आकंठ डूबी हुयी ..युगलवर की सेवा में अपने को लगा देती हैं । इनकी साधना , जप , तप जो कहो यही है ।
अरे, आप लोग इस निकुँज रस को सामान्य समझे हो क्या ? यहाँ तो कोटि कोटि रतियाँ अपने को निछावर करती रहती हैं , उज्वलता निकुँज का मार्जन करती है ...स्वच्छता शय्या रचती है ..और ये सब देखकर चतुरता अजी ! लजा जाती है, अब क्या कहोगे उस निकुँज के विषय में ।
चलिए ...कहना क्या है ....दर्शन ही कर लीजिए ...साक्षात् ।
॥ दोहा ।।
चकचौंधी नैंनन लगी, देखत दुलहनि रूप।
अब दूलह देखौ सखी, सुंदर अतिहिं ॥
अति सुंदर तन सोहने, मनमोहन अभिराम ।
बरनत बैंन बनें न सखि, कमलनैंन घनस्याम ॥
|| पद ||
घनस्याम बरन तन कमलनैंन वर बरनत बैंन बनैं न सखी।
अति सुंदर सोहन मन मोहन मूरति मंगलमैंन सखी ॥
सुही पाग सिरपेच सुनहरी छोंगा अति छबि देत सखी।
लहलह मुक्त लरनि सँग बिलगी किलँगी हिय हर लेत सखी ॥
तिलक भाल तिरछौंहीं भौंही बिहसौंही चखि लोल सखी।
अलक रलक श्रुति कुंडल सोंमिलि झलकत ललित कपोल सखी ॥
नासा अग्रमुक्ता मंजुल की दुति रहि दमकि सखी।
अधर अरुन रस भीनी रसना रदचौका रह्यौ चमकि सखी ॥
सुखदेंनी रससनी मनोहर मृदु मुख हँसनि रँगीली सखी।
चिबुक दिठौनी अति लौनी की रहिछबि छाय छबीली सखी ॥
कंठी कंठ कसिब कंचुक पर बर मुक्ता मनि-माल सखी।
सह आभरन अंस अवतंसी अद्भुत बाहु बिसाल सखी ॥
कटि तट पटुका हरित जरी अति लसि अतलस निज बसन सखी।
पटी पुरट सुघटी जटि जतननि निर्मित रतननि रसनि सखी ॥
चरन चारु आभूषन भूषित नख पदतर अरुनई सखी।
श्रीहरिप्रिया प्रान की सोभा पर मैं बलि बलि गई सखी ॥ १६९ ॥
*******सुन्दर “रस निकुँज” में फूलों के सिंहासन में विराजमान दुलहा और दुलहन का रूप सौन्दर्य देख देखकर सखियाँ बलि बलि जा रही हैं ...पहले प्रिया जी ...जो दुलहन के भेष में विराजी हैं ...उनके रूप-गुण का सखियों ने गान किया ...जय जयकार किया । किन्तु हमारे दुलहा सरकार ...अब इनका भी तो गुणगान होना चाहिए ना , ये बात सखियाँ समझ गयीं ...छोटे से किशोर अवस्था के श्यामसुन्दर और छोटी किशोर वय की ही हमारी श्रीकिशोरी जी । दोनों छोटे छोटे हैं । अरी सखियों ! देखो तो सही हमारे लाल जू ने कैसे कंदुक की तरह अपना मुँह फुला लिया है ....हरिप्रिया सखी जू से सखियाँ पूछती हैं ...क्यों ? हरिप्रिया लालन की ओर देखकर तृण तोड़कर फेंक देती है ...और कहती ये रिसाय गये हैं ...क्यों ? हरिप्रिया सखी कहती हैं ...क्यों की हमने प्रिया जी के ही गुण को गाया ...इनके नही । ये सुनते ही पूरा सखी समाज खिलखिलाकर हंस पड़ता है ।
देखो ...प्रिया जी के रूप का दर्शन करके तो हमारी आँखें चुधियाँ गयीं हैं ...अब थोड़ा श्याम वरण इन लालन को भी देख लो ...ये बात श्रीरंगदेवि सखी जू ने पूरे सखी समाज को कहा था ।
तब अग्रवर्ति सखी हरिप्रिया ने कहा ...हाँ , हाँ .....यही ठीक रहेगा ।
“तो गाओ”......हए ! प्यारे से श्याम सुन्दर ताव में बोले थे ।
बस फिर क्या था बलैयाँ लेते हुए ....सखियों ने गायन शुरू किया ...प्रमुख तो हरिप्रिया ही हैं ...ये तो कहने की बात ही नही है ।
सखियाँ अब लाल जू को निहार रही हैं ....आहा ! श्याम रंग का ऐसा जाल है ये कि कोई भी फंस जाए इसमें तो । कितने सुन्दर लग रहे हैं हमारे छैल छबीले नागर। अरी सखियों ! इनके इस सौन्दर्य सिंधु का वर्णन कैसे करें ! हमारी तो वाणी ही मौन हो रही है , हे कमल नयन घनश्याम ! आपकी जय हो जय हो ।
अब श्याम सुन्दर प्रसन्न हुए और बड़े तन कर प्रिया जी से सट कर बैठ गये हैं ।
नव दुलहन को निहार लिया अब इन नवल दुलहा को भी निहार लो ....ये घनश्याम हैं ...घन , मेघ के समान इनका वरण है ...और नयन इनके कमल के समान हैं । हे सौन्दर्य के अधिपति ! आपके गुण गन हम क्या सुनायें ....बस आपकी बलैयाँ लेती हैं , ये सखियों ने कहा ...तो प्रिया जी ने अपने प्रियतम की बलैयाँ ली ...इस बात से तो लाल जू और फूल गये थे ।
सखियाँ लाल जू के रूप पर मोहित हो उठी हैं .....
हे अलबेले रसिक ! आपकी रूप राशि को जो कोई भी देख लेता है ...उसका मन बलात् आप चुरा लेते हो ...और तो और स्वयं मन के मालिक मनोज यानि कामदेव के भी मन को चुराने वाले आप हो ...आपकी जय हो , जय हो ।
हे सौन्दर्य सिन्धु ! आपके सिर में जो शाही पगड़ी है ना , ये बहुत सुंदर लग रही है , इससे आप और भी सुन्दर दीख रहे हो...और पगड़ी में लगा सुनहरे रंग का सिर पेंच , ओह ! इसमें तो हम सभी सखियाँ का मन फंस गया है ..अब क्या करें ! हे रूप के धनी ! आपकी तो सदा हीं जय जय हो ।
ये कहते हुए सखियाँ भाव विभोर हैं ।
और प्यारे ! इतना ही कहाँ ...आपकी पगड़ी में लगी हुई मोतियों की लड़ी तो और अद्भुत है ....कैसे लहलहा रही है ....और पगड़ी के ऊपर खिली हुई कलंगी , ये तो ऐसी प्रतीत हो रही है मानौं -सौन्दर्य-सार ने अपनी ध्वजा फहरा कर ये बता दिया हो ...कि इनके समान कोई नही है सौन्दर्य और माधुर्य में । हे सौन्दर्य-माधुर्य के सार ! आपकी जय हो , जय हो ।
सखियाँ ने अब फूलों से भरे डलिए अपने पास रखवा लिए ...और झूमती नाचती ...लाल जू के ऊपर वो फूल बरसाती हैं ।
हे नवल किशोर जू ! आपके माथे का तिलक तो आपके मुख चन्द्र और को दिव्य बना रहा है ...तिरछी भौंहें , उस पर नयन की चंचलता ! उफ़ ! हम सखियाँ तो आप पर मर ही गयीं हैं ...हे रूप रसाला ! अब इन नयनों से करुणा बरसा कर हमें जीवन प्रदान करो ।
हे श्याम घन ! आपकी ये घुंघराली अलकें ....हम सब को फाँस रही हैं .....और उस पर कानों में कुण्डल ....वो जब आपके कपोल को छूते हैं तब तो ऐसा लगता है ...भाग्यशाली हैं । हे परम कृपाला ! कुण्डल को भी अपने कपोल छूने दे रहे हो ...आप से बड़ा कृपालु और कौन होगा !
सखियाँ नृत्य कर रही हैं , गीत गा रही हैं ....रस निकुँज आज अत्यधिक प्रफुल्लित है ।
हे लाल बिहारी ! आपकी जय हो .....आपके अधरों की लाली , जो सहज लाल हैं ....ऐसे लग रहे हैं जैसे रस से भरे हैं ....और आपकी जिह्वा वो भी लाल ...और इन सबमें जो दंतपंक्ति हैं ...वो तो धवल श्वेत , हे प्यारे ! आप जब खुल कर हंसते हो न , तो उस समय इन सबके दर्शन होते हैं ....बस फिर तो लगता है ...अधरों की लाली देखूँ या अधरों की लाली से लाल हुई जिह्वा देखूँ या इन लाल ही लाल में बत्तीस जो उज्ज्वल मोती बनकर बैठे हैं ....उन दंतपंक्ति को निहारूँ ....ओह ! हे हम सबके प्राण जीवन ! आपकी जय हो जय हो ।
हरिप्रिया अब पुष्प उछालती हैं ....सखियाँ भी लाल जू के ऊपर पुष्प डाल रही हैं ...ये मस्त बैठे हुए हैं....श्रीरंगदेवि जू ने प्रिया जी के मनोभाव को जान लिया और पुष्पों का एक डलिया प्रिया जी के सामने रख दिया ...अब तो प्रिया जी पुष्प लेकर लाल जू के ऊपर डालती हैं ...उन घुंघराली अलकों में फूल ही फूल हो गये हैं जिससे श्याम सुन्दर की शोभा और बढ़ गयी है ।
हे प्यारे ! आपके तो प्रत्येक अंग अंग में टोना है ....आपका विशाल वक्षस्थल , आपके आजानबाहु ...इतना ही नही .....कटि के नीचे पीला पटुका , ऊपर चमचमाती पीताम्बर ...उस पीताम्बर में सुवर्ण के सितारे , ओह ! सखी ! देख तो ...मेघ श्याम के अंग में ये पीताम्बर कितना सुन्दर लग रहा है ...ऐसा लग रहा है जैसे सूर्य का प्रकाश इसी पीताम्बर ने पी लिया हो ।
अब तो निकुँज में बाजे गाजे बजने लगे ...बज तो रहे ही थे ...किन्तु अब ज़ोर शोर से ..
तभी हरिप्रिया सखी लाल जू के चरणों में गिर जाती हैं .....और उन चरणों को देखकर कहतीं हैं ....कितने सुन्दर चरण हैं ना आपके ....चमक तो चरणों के नख में है ...हे नयनाभिराम श्याम ! आपके चरणों के नख से ज्योति प्रस्फुटित हो रही है ...जिससे समस्त में जग मग हो रहा है ।
हे हमारी प्रिया जी के दुलहा सरकार ! आपके गुणगन को हम क्या गायें ! बस ये अपने प्राण , हम सब सखियाँ आपके श्रीचरणों में चढ़ाती हैं ...और प्यारे ! बलि बलि जाती हैं । इतना कहकर हरिप्रिया साष्टांग श्याम सुन्दर के चरणों में लेट जाती हैं ।
जय हो , जय हो , लाल जू की जय हो, सदाहीं जय हो ।
सब सखियाँ प्रेम स्वरूप ही हो गयीं हैं । इसलिए ये सब प्रेमपूर्ण कोलाहल करती हैं ....जिससे लाल जू बहुत बहुत प्रमुदित हो उठते हैं ।
क्रमशः
Hari sharan
Post a Comment
0 Comments
Feel Free To Massage Us