अद्भुत भक्त थे महात्मा हरिदास - चैतन्य ने कहा || भाग-49
निष्किंचनानां न वृणीत यावत्...
(श्रीमद्भागवत)
ओह ! इस विरह को मैं कैसे पचा पाउँगा ।
मेरा हरिदास चला गया… क्यों गए तुम हरिदास ?
चैतन्य हरिदास के शव से लिपट लिपट कर रोये जा रहे हैं ।
तुम आदर्श थे भक्तों के लिए हरिदास ।
भक्ति के इतिहास में तुम्हारा नाम अमर हो गया… ये कहते हुये बिलख रहे हैं चैतन्य ।
चारों ओर भक्तों से घिरे हुए थे चैतन्य... सबके नेत्रों से अश्रु प्रवाह चल रहे हैं ।
पता है तुम लोगों को ! ये नित्य चार लाख महामन्त्र जपकर ही पानी पीते थे ।
हाँ महाप्रभु ! कल शाम को मैं आया था इनके पास… ये लेटे हुए थे… मैंने इनसे कहा भी… हरिदास जी ! आप का शरीर बहुत दुर्बल हो गया है… कुछ तो खा लीजिये… तो इन्होंने कहा… अब नियम नही हो पा रहा है मेरा… मेरा नियम टूट रहा है ।
ये कहते हुये अश्रु प्रवाहित करने लगे थे… हरिदास जी ।
और क्या बात हुयी थी तुमसे ? बोलो ना ?
उन भक्त का हाथ पकड़ कर चैतन्य पूछ रहे हैं ।
महाप्रभु ! मैंने पूछा… क्या नियम टूट रहा है आपका ?
तो ये रोने लगे… नित्य चार लाख महामन्त्र जपता था… पर अब नही जप पा रहा… संख्या याद नही रहती अब ।
हाँ… मुझ से भी यही कहा था… चैतन्य बोले ।
मैंने इन्हें समझाया था… कोई बात नही… नही हो रहा तो मत होने दो… आपके तो रोम रोम से महामन्त्र ही प्रकट हो रहा है ।
चैतन्य महाप्रभु ने कहा… पता है… दो वर्ष पहले की बात है… ये हरिदास मेरे पास आये… और आकर रोने लगे थे… और कहने लगे… मुझ से अपराध हो रहा है… मुझ से पाप हो रहा है… महाप्रभु ! बताइये मैं क्या करूँ ?
मैंने पूछा था - क्या अपराध हो रहा है तुमसे ? बोलो हरिदास ?
तब रोते हुए इस भोले भक्त ने मुझ से कहा था… शौच करते समय अपनी जीभ पकड़नी पड़ती है ।
मैंने कहा… क्यों ?
तब इन हरिदास ने मुझ से कहा था… महाप्रभु ! ये जीभ हरे कृष्ण हरे कृष्ण… महामन्त्र जपती रहती है… रूकती ही नही है ।
मैं शौच में बैठते समय इस जीभ को कसकर पकड़ता हूँ… पर शौच धोते समय तो ? महामन्त्र शौच के समय...!
चैतन्य महाप्रभु रोते हुए ये बात बता रहे थे… तब मैंने इन्हें आलिंगन किया था… हरिदास ! कोई दोष नही है ये… कोई पाप नही है… तुम्हारी स्थिति के लिए बड़े-बड़े साधक तरसते हैं...।
तुम मत पकड़ो अपनी जीभ… इसे जपने दो महामन्त्र… हर अवस्था में… कोई पाप नही है ये ।
ऐसा अद्भुत भक्त था ये हरिदास… चैतन्य महाप्रभु ने कहा ।
फिर थोड़ी देर बाद बोले… मैं "था" क्यों कह रहा हूँ ?
नही… भक्त कभी "था" नही होता… वह ईश्वर की तरह हर काल में… "है"।
भक्त का शरीर ही मरता है… पर भक्त तो अमर है ।
ये कहते हुए… आँखें बन्दकर के बैठ गए महाप्रभु ।
कुछ देर बाद हँसे… और बोले...
एक घटना घटी थी… हरिदास के साथ… सुनोगे ?
सब भक्त बोले… सुनाइये ना महाप्रभु !
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इनका शरीर मुस्लिम था ना...
और बन गए भक्त… भक्त भी कोई साधारण नही… हिन्दुओं को भी पीछे छोड़ दिया… महाप्रभु चैतन्य बता रहे हैं ।
इन्हीं का एक नजदीकी रिश्तेदार था...
वो बड़ा पैसे वाला था...
हिन्दू बन गया है… इसी बात की चिढ़ थी उसे ।
एक दिन किसी वेश्या को उसने बुलाया… और खूब धन दिया… और कहा… हरिदास नामक एक साधू है… उसे बिगाड़ना है तुझे ।
ये ले धन… और अगर ये काम कर दिया… तो इससे भी ज्यादा धन दूँगा ।
वो बाजारू थी… खुश हो गयी… मैं अच्छे अच्छों को बिगाड़ दूँ ये क्या है ?
तो जाओ… और हरिदास नाम है उसका… वो फलाँ जगह में रहता है...।
चली गयी हरिदास के पास ।
सुबह का समय था… भजन में लीन थे हरिदास ।
वो आई… सभ्य महिला बनकर आई… सिर पर पल्लू डाल के… अच्छी बनकर आई ।
आप ही हैं हरिदास जी ? उसने पूछा ।
हाँ… इशारे में ही कहा ।
क्यों कि महामन्त्र जपते थे चार लाख… और उस समय बोलते नही थे ।
जप रहे थे उस समय ।
मुझे आपसे एकान्त में बात करनी है… उस बाजारू महिला ने कहा ।
बैठो ! इशारे में ही… आसन पर बैठने के लिए कहा ।
वो बैठ गयी...।
एक घण्टे हो गए… दो घण्टे हो गए ।
बैठी रही...
नींद आ गयी उसे...।
बहन ! उठो ! चलो ! प्रसाद पा लो… हरिदास जी ने उठाया… और बड़े प्रेम से उसे प्रसाद दिया ।
मुझे आपसे एकान्त में मिलना है… जरूरी काम है ।
हँसे हरिदास… मुझे भी तुमसे जरूरी काम है...
एक काम करो… शाम को आ जाओ !
वह महिला खुश... मटकते हुए बोली...रात में आऊँ ?
हाँ… और अच्छा है… क्यों कि मैं भी सोता नही हूँ रात भर… तुम आ जाओगी तो और आंनद आएगा ।
उस महिला को लगा… बाबा जी तो पहले से ही मुझ से मिलने के लिए तैयार है ।
पर सुनो ! तुम्हें मेरा एक काम करना पड़ेगा… हम लोग नाचेंगे !
बिल्कुल… मैं बहुत अच्छा नाचती हूँ...।
खुश होकर वो चली गयी ।
रात में आई… हरिदास हाथ में झाँझ लेकर नाच रहे थे ।
और महामन्त्र का उच्चारण कर रहे थे ।
वो महिला जैसे ही आई… उसने हाथ पकड़ा हरिदास का… और बोली… मुझे अकेले में आपसे मिलना है… चलो !
हरिदास बोले… जल्दी क्या है… पूरी रात बाकी है… पहले मेरा काम तो कर दो...।
हाँ… क्या काम है ? झेंप कर बोली थी वो महिला ।
ये मृदंग है… बजाओ… और मैं नाचूँगा...
देखो ना ! मुझे मृदंग बजाना ही नही आता… तुम्हें आता है ना ?
"हाँ" बेमन से बोली… और बजाने लगी ।
नही ऐसे नही… उसकी ओर देखो… (श्री कृष्ण विग्रह की ओर)
हरिदास ने इशारे से दिखाया… और कहा… कुछ देर के लिए मेरी ओर मत देखो… उसकी ओर ही देखो ।
वो देखने लगी थी श्री कृष्ण विग्रह की ओर ।
हरिदास गाने लगे… महामन्त्र… वो बजाने लगी ।
बीच बीच में हरिदास की ओर देखती थी… तो फिर मना कर देते हरिदास… नही… इशारे में कहते उसकी ओर… उसकी ओर ही देखो ।
संकीर्तन तेज़ होता गया… हरिदास भाव में रोने लगे...
उस महिला का हाथ पकड़ लिया… मृदंग को रख दो कहा ।
और नाचने लगे… आँखों से आँसू बह रहे थे… और नाचते जा रहे थे...।
साधकों ! प्रेम संक्रामक होता है… है ना ?
छू लिया इस प्रेमी ने उस वेश्या को...
उसके देह में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होने लगा… सामने श्री कृष्ण और साथ में नाच रहा है श्री कृष्ण भक्त… तो क्या काम वासना रह सकती थी अभी भी इसके मन में ?
लोभ खत्म हो गया… वासना सब खत्म हो गया ।
ये रोने लगी… हरिदास और जोर से संकीर्तन करने लगे ।
ये जोरों से और जोरों से… दहाड़ मार मार कर रोने लगी थी ।
चिल्लाये हरिदास… कुछ नही रखा है… इन काम वासनाओं में… क्षणिक सुख है बस… और बाद में गहरा अवसाद !
कुछ नही मिलेगा… कुछ पैसों के लिए ये सब मत करो ।
देखो ! सामने देखो… कितने सुंदर हैं… श्री कृष्ण… इनसे प्रेम करो… इन्हीं की शरणागति ले लो !
बस बोले जा रहे हैं हरिदास… वो रोये जा रही है ।
बोलो… हरि बोल ! बोलो हरि बोल ! हरिदास ने प्रेरित किया ।
हाँ… हरि बोल ! हरि बोल ! हरि बोल !
धड़ाम से गिर गयी वो वेश्या… हरिदास के चरणों में ।
और जब उठी… तो पूर्ण रूप से बदल गयी थी ।
अब ये प्रेमिन बन गयी थी… हाँ सच्ची प्रेमिन !
हरिदास से ही इसने कण्ठी ली थी… और वो भी नित्य चार लाख नाम मन्त्र जपकर ही जप पीती थी ।
बदल दिया था एक वेश्या के जीवन को हरिदास भक्त ने ।
धन्य हो...
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चैतन्य ने रोते हुए कहा… ये ताकत भक्ति की थी...
ये ताकत निस्वार्थ भक्ति की...
नाम जापक भक्तों में… "हरिदास" का नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा ।
इनकी नाम निष्ठा को मैं कृष्ण चैतन्य बारम्बार प्रणाम करता हूँ ।
ये कहते हुए चैतन्य महाप्रभु ने प्रणाम किया ।
अब समुद्र की ओर ले जाने की तैयारियाँ शुरू कर दी थी… जहाँ हरिदास के शरीर को समाधि देनी थी ।
शेष चर्चा कल...
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
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