हरिं नरा भजन्ति तेतिदुस्तरम् तरन्ति ते...

( रामचरितमानस )


क्या हरिदास का शरीर छूट गया ? 


सुबह की वेला थी… जगन्नाथपुरी में वास कर रहे हैं महाप्रभु ।


किसी भक्त ने आकर ये सूचना दी थी… कि आपके परमप्रिय हरिदास ने शरीर त्याग दिया ।


ओह !  ये सुनते ही दौड़ पड़े चैतन्य ।


कहाँ है मेरा हरिदास !


यही वाक्य बारम्बार दोहरा रहे थे चैतन्य ।


हरिदास का शरीर पड़ा हुआ है… अब इस शरीर में प्राण नही हैं ।


चैतन्य दौड़े… और जाकर हरिदास के मृत शरीर को अपनी गोद में उठा लिया...


और रोते हुए… 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।


नाचने लगे थे… गोद में हरिदास का शव था… और महामन्त्र का उच्चारण करते हुए… नाचे जा रहे थे महाप्रभु !


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ये भक्त हरिदास मुसलमान थे...


पर   " इश्क़ न देखे जात और पाँत"...


प्रो. अकबर हुसैन ने अपने साथ के दो छात्रों को बताया ।


साधकों !  आपको याद है ना बांग्ला देश के प्रोफेसर अकबर हुसैन ?


जो आये थे नवद्वीप  बांग्ला देश से… छात्रों के साथ शैक्षिक भ्रमण में… पर चैतन्य की भूमि ने इन्हें यही का बना दिया...


भक्त बना दिया...।


आपको बता दूँ… अकबर हुसैन के बचपन के मित्र… बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी में साथ में पढ़े… "गौरांग दास" ...जो बांग्ला देश छोड़कर  नवद्वीप में साधू बन कर रहे थे...।


उनसे प्रोफेसर साहब का मिलना हुआ (ये बात मैं पूर्व में बता चुका हूँ)


हाँ आपको ये भी बता दूँ… प्रोफेसर अकबर ने गौड़िया वैष्णवी दीक्षा ले ली… और साथ में उनके  जो दो छात्र नवद्वीप ही रह गए थे… उन्होंने  प्रोफेसर साहब से दीक्षा ले ली थी ।


"अनन्त दास"


प्रोफेसर अकबर हुसैन साहब का नाम चेंज हो गया था ।


नित्य 1 लाख महामन्त्र जपना इन्होंने शुरू कर दिया था ।


अध्यात्म की गूढ़ता का ज्ञान भगवत्कृपा से इन्हें होने लगा...


और सही बात है… ईश्वर की कृपा हो तो क्या नही हो सकता ।


आहा ! "प्रकाशते क्वापि पात्रे"  यह भक्ति का प्रकाश  किसी किसी पात्र में ही होता है… ये कहना है भक्ति के आचार्य देवर्षि नारद जी का… नारद भक्ति सूत्र में ।


तो आप ये तो कह नही सकते… कि ये ईश्वरीय भक्ति मात्र हिन्दू की ही प्रॉपर्टी है… हिन्दू भी  अभक्त हैं… और मुसलमानों को भक्ति में डूबते हुए भी देखा गया है… इतिहास साक्षी है ।


मुण्डित सिर… हाथ में श्रीमद्भागवत और चैतन्य चरितामृत लिए हुये… गले में झोली माला… अभी गले में है… नही तो हाथों में ही रहती है… अभी 1 लाख माला पूरा होने में… कुछ बाकी है ।


मस्तक में  गोपी चन्दन का उर्ध्व पुण्ड्र लगाये हुए हैं...


और गंगा के किनारे… नवद्वीप में… साँझ के समय चैतन्य चरित सुना रहे हैं… अनन्त दास… उर्फ़  प्रोफेसर अकबर हुसैन ।


ये महात्मा हरिदास कौन हैं ? 


छात्रों ने पूछा ।


हमारी तरह ही पूर्व में मुसलमान थे...


पर प्यार... ये जात पाँत कहाँ देखता है ? 


अनन्त दास ने अपने छात्रों को हँसते हुए कहा ।


हमें देखो… प्रेम हो गया श्री कृष्ण चैतन्य से...


अब प्रेम तो प्रेम है… कोई हिसाब किताब करके तो प्रेम होता नही है… लाभ या हानि प्रेम ने देखी  ही कहाँ है !


तो ऐसे ही हो गया प्रेम हरिदास को...


बन गए चैतन्य के परम भक्त ।


हाँ… शादी शुदा थे… बालक भी था इनका ।


नवद्वीप के ही थे...।


( साधकों !  चैतन्य महाप्रभु के जीवन में दो हरिदास का उल्लेख है एक छोटे हरिदास… और एक महात्मा हरिदास… इनको महात्मा हरिदास के नाम से जानते थे… चैतन्य इनसे ज्यादा प्रेम करते थे )


नवद्वीप की ही एक घटना है… जब  सन्यास नही लिये थे महाप्रभु...।


घर घर में जाकर संकीर्तन करते थे...


तभी अपने पूरे परिवार के सहित… इस्लाम  धर्म को त्याग कर… वैष्णव बन गए ये हरिदास ।


महामन्त्र बोलो… महामन्त्र जपो… सारे पाप धुल  जायेंगे ।


भक्ति में सबका अधिकार है… प्रेम को कोई बाँध नही सका है ।


महाप्रभु ने उपदेश दिया था...।


पर मैं तो यवन हूँ… मुसलमान हूँ...


हँसे थे चैतन्य… बोलो… 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

 हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।


बड़े प्रेम से बोले थे हरिदास...।


बस दौड़ कर गले से लगा लिया था हरिदास को… चैतन्य ने ।


अब तो घर में नित्य संकीर्तन… पूरा परिवार मिलकर संकीर्तन करता था… हरिदास का ।


नियम से  4 लाख नाम मन्त्र जपकर ही पानी पीते थे हरिदास ।


तभी तो चैतन्य के प्रिय बने ये ।


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हे भगवन्  !  आज शाम को मेरे घर में संकीर्तन रखा जाए… ऐसी मेरी इच्छा है… आप कृपा करो  प्रभु !  प्रार्थना की थी हरिदास ने ।


अरे ! हरिदास… इसमें कहने की क्या बात है… मैं आऊंगा… और सब परिकर आयेंगे मेरे साथ… रात भर संकीर्तन होगा...


क्या चाहिये था हरिदास को… आनन्द में भर कर अपने घर की ओर  चल दिए… मार्ग में जो भी मिलता… उसे कहते… भैया ! आज  मेरे घर संकीर्तन है… आप आना… प्रभु आयेंगे… बहुत आनन्द आएगा...।


इस तरह दिव्य खुमारी में भर कर अपने घर में आये हरिदास ।


सुनिये !  पत्नी ने हरिदास से कहा...


क्या है… तू उदास क्यों है ? 


बेटे की तबियत खराब हो गयी है… बुखार उतर ही नही रहा… पत्नी ने कहा ।


कोई बात नही सब ठीक हो जाएगा… तू दवाई दे दे… और शाम के संकीर्तन की व्यवस्था में लग जा… इतना कहकर हरिदास फिर व्यस्त हो गए… शाम के संकीर्तन की व्यवस्था में ।


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शाम होते ही… संकीर्तन मण्डली आ गयी थी… हरिदास के यहाँ ।


चैतन्य देव (उस समय ये निमाई थे) आये… संकीर्तन शुरू हुआ ।


भावावेश में नृत्य कर रहे थे चैतन्य देव और उनके साथ हरिदास अन्य सभी परिकर थे… प्रेम ऊर्जा से भर गया था हरिदास के घर का वातावरण… सब नाच रहे हैं… सब गा रहे हैं...


हरि बोल ! 


बीच बीच में उच्चारण करते हैं… और महामन्त्र का संकीर्तन ।


तभी हरिदास की पत्नी आई… नाच रहे हैं हरिदास… भावावेश में डूबे हुये हैं सब लोग...


सुनिये ! सुनिये ना ! 


नाचते हुए हरिदास को झँकझोरा उनकी पत्नी ने ।


दो तीन बार के बाद हरिदास ने सुना कि उनकी पत्नी उन्हें कुछ कहना चाहती है...।


धीरे से बाहर आये हरिदास... क्यों कि संकीर्तन  में विघ्न नही डालना चाहते थे ।


क्या हुआ ?  क्यों घबड़ाई हुयी हो ?


पत्नी ने कहा… देखो ना… हमारा बेटा आँखें ही नही खोल रहा...

न इसकी सांसें ही चल रही हैं… न धड़कन ।


हरिदास बेटे के पास गए… देखा… साँसे थम गयी थीं ।


नाड़ी बन्द हो गयी थी… धड़कनों ने साथ छोड़ दिया था ।


ओह !  ये तो  मर गया… हरिदास के मुँह से निकला ।


रोने लगी दहाड़ मार मार कर हरिदास की पत्नी ।


तुरन्त रसोई घर में गए हरिदास… और चाक़ू लेकर आये...


अपनी पत्नी को दिखाते हुए बोले… अगर तूने ये रोना धोना बन्द नही किया… तो दूसरी लाश तेरे पति की होगी ।


संकीर्तन में विघ्न नही होना चाहिए… बस ।


इतना कहकर हरिदास संकीर्तन में चले गए ।


नृत्य चल रहा था… सब महामन्त्र का उच्चारण करके नाच रहे थे ।


तभी एकाएक संकीर्तन को चैतन्य ने रुकवा दिया ।


क्या हुआ  प्रभु ! कितना आनन्द आ रहा था आप रुक क्यों गए ?


हरिदास ने हाथ जोड़कर पूछा ।


पता नही क्यों भाव नही बन रहा...


हरिदास !  बताओ ना… क्या बात है आज मेरा भाव क्यों नही बन रहा ?


चैतन्य बार बार पूछने लगे हरिदास से ।


सिर झुकाकर खड़े रहे हरिदास ।


तभी सुबुकने की आवाज चैतन्य ने सुनी...


गए… जहां से ये आवाज आरही थी ।


पत्नी रो रही है हरिदास की… सामने लाश पड़ी है ।


अरे !  ये कौन है  ? 


पत्नी ने अपने पुत्र के शव को चैतन्य के चरणों में रख दिया ।


ये मेरा बेटा है… प्रभु ! मर गया… कृपा करो !


पत्नी दहाड़ मार मार कर रोने लगी ये कहते हुए ।


मर गया ? अरे नही...


पुत्र ! उठो !  देखो !  यहाँ संकीर्तन हो रहा है… तुम्हारे घर में संकीर्तन हो रहा है… और तुम सो रहे हो ? नही… संकीर्तन के समय सोना नही चाहिए… उठो ! चैतन्य ने जैसे ही ये कहा ।


देखते ही देखते… वो बालक तो जिन्दा हो गया...।


उठ गया...।


बोलो ! हरि बोल ! बोलो हरि बोल !


 ये कहते हुए जोर जोर से चिल्लाने लगा ।


हरिदास धड़ाम से धरती में गिर गए थे उस समय...


फिर जो संकीर्तन हुआ… हरिदास के घर में वो वर्णन से परे था ।


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हरिदास !  तुम भक्तों में शिरोमणि हो...


हरिदास !  तुम्हारी नाम निष्ठा अद्भुत है...


तुम्हें पाकर ये धरती भी धन्य हो गयी है...


ये कहते हुए जगन्नाथ पुरी में आज चैतन्य महाप्रभु रो रहे थे...


गोद में हरिदास का शव था...


जल लाओ… मैं इन नाम निष्ठ भक्त के चरणों का जल पीऊंगा ।


चैतन्य महाप्रभु अपने परिकरों को हरिदास के बारे में बता रहे हैं… जल लेकर पी रहे हैं… हरि बोल ! हरि बोल !  नाम का उच्चारण कर रहे हैं ।


तुम मुझे क्यों छोड़कर चले गए...?  


मैंने मना किया था ना कल तुम्हें… पहले मैं जाऊँगा… फिर तुम जाना… अब मेरा साथी कौन है हरिदास ?


चैतन्य महाप्रभु बिलख रहे हैं ।


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अनन्त दास (प्रो. हुसैन)  ये चरित सुनाते हुए रो रहे थे...


हरिदास महाराज की जय हो...


महाप्रभु श्री कृष्ण चैतन्य की जय हो...


ये कहते हुए… कुछ देर के लिए सब मौन हो गए ।


शेष चर्चा कल...


"श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द हरे कृष्ण हरे राम श्री राधे गोविन्द"